हिंदी दिवस पर निबंध

                                                                          महेश तिवारी

                                                                         8006820395

*प्रस्तावना-* वर्तमान में उद्देश्य की उपेक्षा ही प्रतीत होती दिखी है, परन्तु संघर्षरत प्रयत्नरत रहते हुए भी स्वदेश के साथ ही साथ 100 से अधिक देशों के विश्वविद्यालयों में  विषयों/पाठ्यक्रम के रूप  में स्थान प्राप्त कर अध्ययन अध्यापन होता है। तो उपेक्षा तो  हुयी कुछ निरर्थक उन्मादी तत्वों के कारण,फिर भी  अपनी योग्यता ,वैज्ञानिकता,विशिष्टता, सरलता,सर्वसुलभता आदि के आधार पर इतने अधिक देशों में महत्वता प्राप्त तथा उपयोगिता सिद्ध कर रही है।

*उद्भव एवं विकास-* हिन्दू/हिंदुस्तान शब्द का सर्वप्रथम  उल्लेख लिखित रूप में जैन ग्रन्थ *निशिथचूर्णी* में मिलता है,ग्रन्थ का समय लगभग 8वीं सदी है।उत्पत्ति सम्बन्धी भी अनेक मत प्रचलित हैं ,हम दो ही का उल्लेख करते हैं-

१- जो सर्वाधिक प्रसिद्ध है- सिंधु शब्द का रूपांतर हिन्दू/हिंदी है। (ईरानी/फ़ारसी में स को ह पढ़ा जाता है)

२- *हिंदीवादियों के अनुसार-* हिन्दू शब्द दो शब्दों के योजन से बना है- हिन् धातु- हनन करने के अर्थ में,दु- दुष्ट जनों का अर्थात दुष्ट जनों का जो हनन करे वह हिन्दू।

और हिंदुओं के द्वारा बोली जाने वाली भाषा हिंदी है अथवा हिंदुस्तानियों के द्वारा बोली जाने वाली भाषा हिंदुस्तानी।

*सी.टी.मेटकॉफ-* भी उक्त को ही सम्बोधित करते हैंकि हिंदुस्तानियों के द्वारा बोली जाने वाली भाषा हिंदुस्तानी।

*जॉर्ज ग्रियर्सन-* हिंदी को "आम बोलचाल की महाभाषा"(great Lingua Franca) कहा है।

*विकास* संस्कृत➡️पालि➡️ प्राकृत ➡️अपभ्रंश➡️ अवहट्ट➡️ हिंदी ।

अवहट्ट से आधुनिक हिंदी तक के मध्ये में भी हिंदी के अनेक रूप देखने को अथवा अनेक प्रसिद्ध  काव्य गद्य आदि पढ़ने को मिलते हैं। जिनमे प्रमुख ब्रजभाषा अवधि आदि।इन भाषाओं अथवा बोलियों में काव्य अथवा बोलचाल में प्रयोग अभी भी पूर्ण रूप में होता है, परन्तु संविधान ने जिस भाषा को अंगीकार अथवा स्थान दिया वह खड़ी बोली हिंदी है।

(8वीं अनुसूची में संविधान द्वारा  २२प्रादेशिक भाषाओं को सम्मिलित किया हुआ है)

*राष्ट्रभाषा/राजभाषा-*  राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक जिस एक भाषा में विचार विनिमय कर सके वह राष्ट्रभाषा होती है।

राष्ट्र के अधिक नागरिक जिस भाषा में विचार विनिमय कर सके अथवा कार्यालय आदि में जिसका प्रयोग हो वह राजभाषा होती है

हिंदी भाषा हो राष्ट्रभाषा पर महात्मा गांधी जी के विचार अति श्लाघनीय हैं जिन्हें अपनाना ही चाहिये- *राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है।*

2- *हिंदी ही हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है और होनी भी चाहिये।*

3- *अंग्रेजी की शिक्षा देना उन्हें गुलामी में डालना जैसा है।अंग्रेजी हमारे पैरों पर बेड़ी बनकर पड़ी हुई है*

राष्ट्रभाषा क्यों जरूरी है- किसी भी राष्ट्र की उन्नति के लिये उसकी एक राष्ट्रभाषा निश्चित हो जिसमे राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक विचार विनिमय कर सके।

*नोट-अभी  १४/९/१९४९(14/9/1949)तक अर्थात स्वतंत्रता से पूर्व की वार्ता को संक्षेप रूप मे तथ्य स्पष्ट करने की कोशिश की गई है- अब इससे आगे*

स्वतंत्रता प्राप्त होने के पर्यंत एक चिंगारी प्रस्फुटित होने लगी कि राष्ट्रभाषा हिन्दी हो जिसे सहर्ष स्वीकार भी किया गया हिंदी भाषियों व अहिन्दीभाषियों के द्वारा परन्तु कुछेक प्रतिपक्ष बन गए,जिस कारण संविधान सभा की ११/९/१९४९को हुई  बैठक में हिंदी के साथ ही साथ संस्कृत,अंग्रेजी आदि भाषाओं पर विचार किया गया। बहस दो ही पर प्रमुख रूप से हुयी हिंदी और दूसरा अंग्रेजी ।

*१४/९/१९४९ को संविधान सभा ने हिंदी को वास्तविकता के साथ स्वीकार किया क्योंकि हिंदी जन जन प्रिय,अधिकांश जनों की अर्थात ४६ प्रतिशत से अधिक जनों द्वारा बोली जाने वाली भाषा थी इसलिये हिंदी को राजभाषा बनने का न्याय प्राप्त हुआ।*

(गुलामी को अस्मिता मान चुके आंग्ल प्रियजनों के कारण हिंदी राष्ट्रभाषा नही बल्कि राजभाषा तक ही सीमित रह गयी। अतःजिसका खामियाजा आज भी भुक्ता जा रहा है।

मुंशी अयंगार निर्णय- 1- हिंदी राजभाषा है न् कि राष्ट्रभाषा।

2- संविधान लागू होने के बाद 15 वर्षों तक अंग्रेजी में ही कार्य होंगे।

➡️संविधान में भाषा सम्बन्धी तथ्य अनुच्छेद ३४३ से लेकर से ३५१तक स्पष्ट हैं।

*आयोग-* हिंदी को सर्वसुलभ करवाने,राष्ट्रभाषा हो आदि तथ्यों को चिह्नित करते हुए आयोगों का गठन हुआ जिसमें सर्वप्रथम  *राजभाषा आयोग/ बालगंगाधर(बी.जी ) खेर आयोग- ७जून१९५५ को(गठन) हुआ* तथा प्रतिवेदन  ३१-जुलाई१९५६ को सरकार को दिया गया।

दूसरी *संसदीय राजभाषा समिति/गोविंद वल्लभ (जी.बी.) पन्त समिति १६नवम्बर१९५७को गठन* तथा प्रतिवेदन ८फरवरी१९५९ सरकार को दिया गया।


*राजभाषा अधिनियम १९६३(१९६७में संसोधित* संविधान के अनुसार १९६५ से सभी कामकाज हिंदी में सुचारू रूप से होने थे परंतु सरकार की  भ्रष्ट नीतियों व  उचित निर्णय न लेने के कारण सम्भव न हो पाया और अहिन्दी भाषी प्रदेशों में हिंदी राष्ट्रभाषा होने का विरोध/उन्माद  होने लगा।तथा समर्थन प्रतिक्रिया रूप में हिंदी भाषी क्षेत्रों में   जनसंघ भी तभी से आविर्भाव अर्थात अस्तित्व में आया

                                *निष्कर्षस्वरूप*


राजभाषा का उद्देश्य जंहा हिंदी को1965 से उत्कर्ष पर होना चाहिए था,वहां उन्मादों के कारण २६जून१९६५से राजभाषा अधिनियम,१९६३के तहत द्विभाषिक स्थिति को लागू कर दिया गया ।स्पष्ट किया गया कि सरकारी प्रयोजनों के लिये हिंदी व अंग्रेजी दोनों ही में समानरूप से कार्य किये जा सकेंगे। अतः उक्त निर्णय आज भी प्रभावी है।

                                                   

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

संस्कृत में प्रार्थना पत्र

भाषा विज्ञान